नमो सूर्यसूता तुझी धन्य कीर्ती॥
न चाले मती वर्णिता स्तब्ध होती॥
लिलानाटकी अंत ना पार माया॥
अहा धन्य तुझी शनीदेवराया॥ १॥
आलि स्वारि ती गोचरिं दृष्टिठायीं॥
सखेसोयरे इच्छिती दुष्टताही ॥
धना हानि होई नसे काहिं माया॥
अहा धन्य०॥ २॥
जगीं मान्यते लौकिकिं द्वेष वाढे॥
कुडें पावडें येति अंगी लिगाडें॥
न मीटे कधीं यत्न जाताति वायां॥
अहा धन्य०॥ ३॥
नंसे कांही कोठें मना जो सुवारा॥
अंतरी येऊनी दु:खभारा॥
करूं इच्छितां गोष्ट जाते अपाया॥
अहा धन्य०॥ ४॥
कुटुंबात जी प्रिय होतीं जिवाचीं॥
तिहीं फिरलीं दुष्ट झालीं मनाचीं॥
नसे तोचि घेती मनामाजि थाया॥
अहा धन्य०॥ ५॥
नसे चैन कांही उदासी मनातें ॥
तुझ्यावांचुनि कोण दे शांति त्याते ॥
नको क्लेश दावूं करीं पूर्ण छाया ॥
अहा धन्य०॥ ६॥
उठे चित्तिं चिंता जिवा रोग लागे ॥
झटे झोंबटें लागती पाठिमागें ॥
अहोरात्र तो त्रास वाटे जिवा या ॥
अहा धन्य०॥ ७॥
अबाधीत लीला तुझी कोण वाणी ॥
चमत्कार तो दाविला शूळपाणी ॥
गिरीकंदरी लाविलासी फिराया ॥
अहा धन्य०॥ ८॥
कथा ऎकिली सर्वही विक्रमाची ॥
आली त्यापरी संधि वाटे अतांची ।
महासंकटे येति कंठी भिडाया ॥
अहा धन्य०॥ ९॥
फुटे छाति ते ऎकतां साडेसाती ॥
आतं ती आली माझिया कर्मपातीं ॥
कृपावंत तूं हांत दे गा तराया ॥
अहा धन्य०॥ १० ॥
किती दु:ख सांगू नसे पार याला ॥
नसे थार कोठे बसाया मनाला ॥
कृपाळूपणें पाहिं तूं होय वाली ॥
प्रितीनें पदीं रूंजि रखमाजिं घाली ॥
अहा धन्य०॥ ११ ॥
इति शन्यष्टक समाप्त ॥
भीमरूपी महारुद्रा, वज्रहनुमान मारुती | वनारी अंजनीसूता रामदूता प्रभंजना ||१||
महाबळी प्राणदाता, सकळां उठवी बळें | सौख्यकारी दुःखहारी, दुत वैष्णव गायका ||२||
दीननाथा हरीरूपा, सुंदरा जगदांतरा| पाताळदेवताहंता, भव्यसिंदूरलेपना ||३||
लोकनाथा जगन्नाथा, प्राणनाथा पुरातना | पुण्यवंता पुण्यशीला, पावना परितोषका ||४||
ध्वजांगे उचली बाहो, आवेशें लोटला पुढें | काळाग्नी काळरुद्राग्नी, देखतां कांपती भयें ||५||
ब्रह्मांडे माईलें नेणों, आवळे दंतपंगती | नेत्राग्नीं चालिल्या ज्वाळा, भ्रुकुटी ताठिल्या बळें ||६||
पुच्छ ते मुरडिले माथा, किरीटी कुंडले बरीं | सुवर्ण कटी कांसोटी, घंटा किंकिणी नागरा ||७||
ठकारे पर्वता ऐसा, नेटका सडपातळू | चपळांग पाहतां मोठे, महाविद्युल्लतेपरी ||८||
कोटिच्या कोटि उड्डाणें, झेपावे उत्तरेकडे | मंद्राद्रीसारिखा द्रोणू, क्रोधें उत्पाटिला बळें ||९||
आणिला मागुतीं नेला, आला गेला मनोगती | मनासी टाकिलें मागें, गतीसी तुळणा नसे ||१०||
अणूपासोनि ब्रह्मांडाएवढा होत जातसे | तयासी तुळणा कोठे, मेरू मंदार धाकुटे ||११||
ब्रह्मांडाभोवतें वेढें, वज्रपुच्छें करू शकें | तयासी तुळणा कैची, ब्रह्मांडी पाहता नसे ||१२||
आरक्त देखिलें डोळा, ग्रासिलें सूर्यमंडळा | वाढतां वाढतां वाढें, भेदिलें शून्यमंडळा ||१३||
धनधान्य पशूवृद्धि, पुत्रपौत्र समग्रही | पावती रूपविद्यादी, स्तोत्रपाठें करूनियां ||१४||
भूतप्रेतसमंधादी, रोगव्याधी समस्तही | नासती तूटती चिंता, आनंदे भीमदर्शनें ||१५||
हे धरा पंधरा श्लोकी, लाभली शोभली बरी | दृढदेहो निसंदेहो, संख्या चन्द्रकळागुणें ||१६||
रामदासी अग्रगण्यू, कपिकुळासि मंडणू | रामरूपी अंतरात्मा, दर्शनें दोष नासती ||१७||
॥इति श्रीरामदासकृतं संकटनिरसनं मारुतिस्तोत्रं संपूर्णम्॥
वडवानल स्तोत्र
विनियोग
ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः|
श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं ||
मम समस्त विघ्न-दोष-निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे ||
सकल-राज-कुल-संमोहनार्थे, मम समस्त-रोग-प्रशमनार्थम् |
आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त-पाप-क्षयार्थं ||
श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये ||
ध्यान
मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये।।
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम ||
सकल-दिङ्मण्डल-यशोवितान-धवलीकृत-जगत-त्रितय ||
वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र |
उदधि-बंधन दशशिरः कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र ||
अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार |
सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार-ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद ||
सर्व-पाप-ग्रह-वारण-सर्व-ज्वरोच्चाटन डाकिनी-शाकिनी-विध्वंसन |
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दुःख निवारणाय ||
ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन |
भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर ||
चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर, |
माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस ||
भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा ||
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते |
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां हां ||
ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं |
ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां ||
शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर |
आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय ||
शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय |
प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा||
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन|
परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु ||
शिरः-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय |
नागपाशानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोटकालियान् ||
यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा ||
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते |
राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र ||
पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय |
नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा। ||
।। इति विभीषणकृतं हनुमद् वडवानल स्तोत्रं ।।